Saturday, April 28, 2012

नाकाम , अधूरा, बेकार और बेबस


कुछ लोग आप से रोज़ मिलते हैं

और मिलते ही लगता है

जैसे आप से पूछ रहे हों

क्यूं अभी भी वैसे ही हो

नाकाम, अधूरे , बेकार, बेबस

थके हारे से आप कह देते हो

नहीं प्रयासरत रहा हूँ मैं

मैंने कोशिश की

कि सच्चाई का घला घोंटूं

पर क्या करुं ,

कुछ साजिशों में व्यस्त रहा मैं

कुछ बच्चों के चन्दा मामा रूठ गए थे

उन को मनवाना था,

कुछ बेटियाँ कोख में दम तोड़ गई थीं

उन का मर्सिया  पढना था,

कुछ लोग प्रेम का पाठ पढ़ते पढ़ते

इज्ज़त की खातिर बलि चढ़ाये गए थे

बीच बाज़ार चीखना था उन के नाम पर,

कुछ सड़क पर फेंके गए रिश्ते दम तोड़ दिए थे

मुर्दा घर की राह दिखानी थी उन को,

किसी माँ का बीच बाज़ार वस्त्र हरण हुआ था

तीन गज़ कफ़न से ओढना था उस की देह को,

क्या करुं दोस्त प्रयास तो किया था बहुत

पर इन साजिशों में व्यस्त रहा मैं

इसीलिए सच का घला नहीं घोंट सका

इसीलिए दिखता हूँ तुम को

नाकाम , अधूरा, बेकार और बेबस!

~प्राणेश नागरी-२६.०४.२०१२


Saturday, April 14, 2012

बेतुका

असंगति में
संगत दर्शाता
बेतुका सा
विवेकहीन चेहरा लिए
क्या जानूं
क्यूं खाली खाली सा हूँ,
मेरे ही हाथ
नहीं उठे होंगे
तुम्हें तो दुआ की
आदत ही नहीं!
सजदा सलाम
सब रह गया मुझ से
इन्तिज़ार ने
कुफ्र सिखा दिया
बुत परस्त हो गया,
ज़मीन पर झुका नहीं
दिल धड़का कि नहीं
कुछ भी याद नहीं !
इलज़ाम नहीं देता तुम्हे
पर क्या करुं ज़माने का
सब जानते हैं
तुम्हारी मेरी दास्ताँ!
इसीलिए बेतुकी सांसें
बेतुकी सरगोशियाँ
और बेतुका एहसास
सौंपने निकला था तुम को
जिसे आज भी
लिए फिरता हूँ दरबदर!
~प्राणेश नागरी -१३.०४.२०१२

Thursday, April 5, 2012


अस्तित्व के मण्डल की परिक्रमा में

शून्य को घूर के देखा है कभी

वक़्त पिगल कर टपकता है

और माथे के बीचों बीच

बड़ा सा सुराख़ कर देता है

जिस के गोलार्द में से

अनगिनत आकार उग आते हैं

और बिखर जाते हैं,इधर उधर

बिलकुल वैसे ही जैसे

बंजर बाँझ ज़मीन पर बिखरे नरमुंड!

मैंने भी बहुत दूर तक शायद

अपने आप का पीछा किया है

मुझे, ना मैं मिला ना धूप मिली

बस घटते बढ़ते अपने साये मिले!

मेरे गीत ना अकेले पड जायेंगे

ना मेरे साथ चले जायेंगे

हाँ जब तक सुध रहेगी

तुम याद बहुत आओगे

और शब्द बन तुम्हारी याद

कागज़ के पन्ने भिगोती रहेगी

फिर एक दिन........

शून्य मुझ में समा जायेगा

अनर्थ से अर्थ का परिचय हो जायेगा!


~प्राणेश नागरी-०५.०४.२०१२

Tuesday, April 3, 2012

जीवन और मृत्यु के बीच का अंतराल कटाक्ष नहीं होता! जब मृत्यु दिखती है तो वह भयानक दिखती है! हर परीक्षण की रपट आते ही आप काँप जाते हैं! जाने किस तस्वीर के उतरने के बाद ,मैं मरने वाला गोषित किया जाऊं?इंसान हर उस भगवान् को याद करता है जिस का वह नाम जानता हो और हर उस इंसान को भी जो इस समय भी रिश्तों को परखता होता है!और जब आप की सोंचने की शक्ति और पूरा सोंचने का निज़ाम बीमार हो जाता है तो आप बिस्तर पर पड़े एक मांस के टुकड़े की तरह हो जाते हैं! आप देखते हैं कि आप की पूरी दुनिया कहाँ तक सिमट गयी है!

और वह क्या कर रहे होते हैं , आप के प्यारे कहलाने वाले? क्या कर रहे होते हैं वह? छोडिये किसी की क्या बात करनी?

हाँ कोई साथ चलता है क्यूंकि उस को चलना ही होता है किसी भी तरह!