
Thursday, December 15, 2011
शब्द कुछ नहीं बोलते

Monday, December 12, 2011
मैं ख़ामोशी सुनाता हूँ!

मैं ख़ामोशी सुनाता हूँ!
मैं सागर का घन -गर्जन हूँ
मैं ख़ामोशी सुनाता हूँ!
एक लम्हे की उड़ान मेरी
सिकुड़ी हुई सर्द रातों मैं
सांसूं की सरगोशी हूँ
और मखमली बिस्तर की
सलवटों मैं पनाह पाता हूँ !
मैं मिथ्या और ब्रम के बीच
मोगरे का महकता फूल हूँ
काया के हवन कुण्ड की
लपटों की लीला के बीच
रटा - रटाया मंत्र हूँ
मैं एक अधूरी मुस्कान हूँ!
रस और गंध की लालिमा
पलकूं को भोजिल कर
सांसूं को जब भटकाती है
राग और वैराग्य की
चोखट पर खड़ा मैं
पुनर्वास के गीत गाता हूँ!
पलकूं की भीगी सरहद पर
यादों का मौन स्पंदन हूँ
सूखी जंगल की लकड़ी को
लहरूं के गीत सुनाता हूँ
मैं सागर का घन -गर्जन हूँ
मैं खामोशी सुनाता हूँ!
Friday, December 2, 2011

आनंद ह्रदय की गरमाहट मैं
Sunday, November 27, 2011
मैं इंसान से फ़रिश्ता हो गया
अलिफ़ अल्लाह चम्बे दी बूटी , मुर्शिद मन विच लाई हूँ
नफी अस्बात दा पानी मिलिया , हर रगे हर्जाए हूँ .
अन्दर बूटी मुश्क मचाया , जान फुल्लां ते आयी हूँ
जीवे मुर्शिद कामिल बहु , जिन एह बूटी लई हूँ
मेरे मुर्शिद ने मेरे मन मैं अल्लाह के नाम की खुशबू वाली भेल लगाई है! मेरे ना मानने से ले कर मेरे खुदा से मिलने तक के सफ़र ने इस भेल को सींचा है! जब अलौकिक सचाई मेरे सामने आई मेरा मन खुशबू से भर गया और अल्लाह के नाम से प्रफुलित हुआ! ऐ मेरे मुर्शिद तुम ने यह खूबसूरत खुशबू वाली भेल मेरे मन मैं लगाई ,अल्लाह करे तू हमेशा मेरे लिए बना रहे!
न मैं अन्दर वेद किताबां
न विच भंगां ना शराबां
न विच रिन्दान मस्त खराबां
न विच जागन ना विच सौन
पांच पीरून ने दस्तक दी
Thursday, November 24, 2011
विस्थापन

Tuesday, November 1, 2011
ज़िन्दगी किसी शामो - सुबह की मोहताज नहीं
तुम्हारे हसीन पाऊँ की दूल है वक़्त
झुक जाती हैं निगाहें झुक जाते हैं सर
हम बस एक ख्वाब देखते हैं
तुम्हारी आंखूं मे!
ख्वाब तुम्हारी आरज़ू का,
ख्वाब तुम्हारी सांस की खुशबू का
और वक़्त की देहलीज़ पर
अपूर्ण से पूर्ण हो जाते हैं
वक़्त तुम्हारे होंठूं की गर्मी में पिगलता है
हर सुबह और हर शाम
तुम्हारे नाम का सजदा करती है
एक परिंदे की पहली परवाज़ है ज़िन्दगी
जो मेरे होने से लेकर
तुम्हारे होने के एहसास तक
तुम्हे ढूंढते ढूंढते मुझे
खुदा तक पहुंचा देती है!
सच है तुम्हारे हसीन पाऊँ की दूल है वक़्त