Thursday, August 11, 2011

Ab chalna hi behtar hai


अब चलना ही बेहतर है!
पूरा आँगन साँझ ढले ही गुम सुम , खोया खोया सा देख रहा है सनाटे में ऊंगती खिड़की की दस्तक! कुछ तो टूटा टूटा सा है , तारा हो या भरम तुम्हारे लौट के आने का ! या फिर टूट गया है बंदन कोई ,कोई वादा, कुछ तो बेशक टूट गया है! टूट गया है ,यूं ही साँसें उखड़ी उखड़ी हैं क्या ? यूं ही क्या कोई उलटे रस्ते जाते जाते छोड़ चला है दूर किसी को छुट पुट गलियूं पर या टेढ़े मेडे रास्तों की ढलानों पर!
अब चलना ही बेहतर है!
दूर है मंजिल राह अकेली संगी साथी एक एक कर के छूट गए हैं! भूले बिसरे गीत थे जितने सब के सब खो डाले हैं ,अब क्या है जो साथ चलेगा!सपने सारे बिखर गए हैं ,बिखर गया माधुर्य स्पर्श का ,बिखर गया काया का आँगन !
अब चलना ही बेहतर है!
मीलूं लम्भी ख़ामोशी को ओढ़े कब तक मील के पत्थर जैसा गिनता जाऊं आने जाने वालूं के पग चिन्हूं को! कब तक शून्य से नीरसता के गान सुनूँ मैं , कब तक मैं मुस्काऊँ जूठी हंसी ठिठोली सहता जाऊं! कब तक सिले सिले होंठूं से हाहाकार मचाऊँ कब तक सूनी सूनी आंखूं से आंसूं की बरखा बरसाऊँ !
अब चलना ही बेहतर है!
पूछूंगा एक दिन मैं तुम से , ऐसी क्या थी खता कि मुझ को बीच बवंडर सोंप दिया लहरूं को? क्या था ऐसा जिस के कारण तोड़ दिए सब बंदन और वह वादे सारे ? जीना सिखलाया था जिस ने हाथ पकड़ कर क्यूं उस को जुट्लाया क्यूं माथे पर उस के तुम ने दाग़ लगाया? एक दिन पूछूंगा मैं तुम से जब धरती क़ी छाती से एक आग का दरिया फूटेगा ,जब अम्बर टूट के बरसेगा तब कौन सी नैया से पार करोगे जीवन के इस सागर को!
पर अब चलना ही बेहतर है!

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