Tuesday, February 14, 2012

तुम ने वादा किया था


तुम ने वादा किया था

तुम ने वादा किया था

परिवर्तन उत्क्रांती का आधार होगा

फिर काल चक्र क्या चाल चला

मैं तुम्हारी ज़रुरत कैसे बना

कैसे रिसती हुई रात तुमने

सौंप दी रेंगते जुगनुओं के रेले को

उफ़ यह दुएँ की लडखडाती लकीर

स्वप्न की पगडंडी कैसे हुई

सब कुछ जमा हुआ सा क्यूं है

क्यूं सांसें अन्धकार मैं झूल रही हैं

क्या सुन नहीं पाते तुम

मसली हुई कोंपलों का चीत्कार

काया के अतृप्त क्षण ,उतावले परिद्रश्य

क्यूं शून्य मैं बटक रहे लावारिस

किसे अब बलि चढ़ाना होगा

त्याग का अर्थ समझाने के लिए

किस संहार की कल्पना मैं हो साधक

अनर्थ का अर्थ करते रहोगे कब तक

~ प्राणेश नागरी १४.०२.२०१२

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